रविवार, 26 अक्तूबर 2014

837-"वाकिफ़ "

"वाकिफ़ "

दीवारों से ,काँच की खिड़कियों से डर है
दरवाजे से तेज हवा न आ जाए डर है

तुमसे कहना बहुत कुछ चाहता है मन
तुम पर कोई तोहमत न लगा दे डर है

गुमनामी में खोई रहती है हम दोनों की मोहब्बत
मासूम हसरतो के कहीं पंर न निकल आये डर है

मैं इस जहाँ मे अजनबी की तरह ही रहता हूँ
किसी मोड़ पर तुमसे फिर भेंट न हो जाए डर है

मैं करता हूँ रोज तेरी ही पूजा और इबादत
इस बात से दुनियाँ वाकिफ़ न हो जाए डर है

किशोर कुमार खोरेंद्र

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