रविवार, 26 अक्तूबर 2014

834-चिंगारी "

चिंगारी "

बंद आँखों से तुम दिखाई देती हो 
चुप रहती हो पर सुनाई देती हो

राहबर से लगते हैं दूर तक फैले जुगनुओ के कतार 
अपनी आँखों से मेरी आँखों में चिंगारी बो जाती हो

रोज रोज देखे गये ख्वाब ही तो एक दिन सच होते हैं 
सपनों के तिनको से नीड का निर्माण कर जाती हो

शिखर को छूने आख़िर झुक ही जाता है आस्मा
प्रेम की उँचाई पर एक सितारे सा जगमगाती हो

मिलना और बिछुड़ना तो एक सिलिसिला है
हर जनम मे मुझसे इसीलिए मिलने तुम आती हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

कोई टिप्पणी नहीं: