रविवार, 26 अक्तूबर 2014

833-"प्रेरणा "

"प्रेरणा "

मैं चेतन हूँ तुम हो मेरी चेतना 
जीने की तुम हो मेरी प्रेरणा

अंजुरी में गंगा जल सी भरी हो 
बंद आँखें चाहती हैं तुम्हें ही देखना

लहरें आ आ कर फिर लौट जाती हैं 
रेत पर लिख जाती हैं विरह की वेदना

जेठ की धूप सा चुभने लगते हैं पल
जब तुम करती हो मेरी अवहेलना

सूनी अमराई में मधुमास सी आ जाओ
अधर चाहते हैं बाँसुरी पर मधुर तान छेड़ना

किशोर कुमार खोरेंद्र

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