रविवार, 26 अक्तूबर 2014

832-"अनुराग "

"अनुराग "

दिन में रहते हो तुम साथ मेरे आफताब से
रात मे रहते हो तुम साथ मेरे महताब से

तुम्हें भेजे गये खतों को बार बार पढ़ रहा हूँ
तन्हा रह गया हूँ अब तक न मिले जवाब से

तुम प्यार का आठवाँ गाड़ा रंग हो
जिसे देखता हूँ अक्सर अपने ख्वाब से

तुमसे रूबरू मिला नही हूँ कभी
मन में रोज खिलते हो पर गुलाब से

तुमसे मिलकर ही चैन आएगा
करार नहीं पढ़कर तुम्हें किताब से

बरफ बादल शबनम कोहरा इंद्र धनुष
इनसे भी ज़्यादा लगते हो तुम मुझे नायाब से

ज़िक्र होता हैं जब भी तुम्हारा
खिल आते हो कमल सा तालाब से

दीए सा जलता रहता हूँ निरंतर तेरी याद में
शमा सा पिघलते रहता हूँ तुम्हारे अनुराग से

किशोर कुमार खोरेंद्र

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