रविवार, 26 अक्तूबर 2014

831-"वफ़ा "

"वफ़ा "

इस किनारे मैं उस किनारे तुम रहे 
तेरे मन में मैं मेरे हृदय में तुम रहे 

सावन में जब उफ़न कर उमड़ आई नदी 
बिछुड़ें हुऐ लहरों सा हम दोनों मिलते रहे 

बहारों का जब जब मौसम आया 
एक ही टहनी पर फूलों सा खिलते रहे 

रात में जब घना तम छाया
दो सितारों सा जगमगाते रहे

कोयल जब अमराई मे गाने लगी
फागुनी बयार सा महकते रहे

प्रेम को जीकर इसी तरह से
वफ़ा जन्मों तक निभाते रहे

किशोर कुमार खोरेंद्र

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