रविवार, 26 अक्तूबर 2014

828-घना सहारा

घना सहारा 

चाँद सा जिसका सुंदर चेहरा है 
उसकी चाँदनी ने मुझे आ घेरा है 

हर तरफ उजाला सा लगता है 
वहाँ का छट गया अंधेरा हैं 

रात भर सपनों में तारो सा जगमगाते हो 
मेरे ख्यालों मे तेरी यादों का सुनहरा सवेरा है 

घोसलें में शाम होते ही लौट आते हैं जैसे पंछी
मेरा हृदय भी तेरे इंतज़ार का रैन बसेरा हैं

बहारों के मौसम सा लगाने लगा हैं हर एक पल
अपने अपने दिल पर अधिकार अब रहा न तेरा न मेरा हैं

पेड़ के नीचे छाँव ठहरी रहती हैं जैसे
तेरी पलकों में मेरे लिए घना सहारा हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

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