रविवार, 26 अक्तूबर 2014

825-"महताब "

"महताब "

आजकल लगती है मुझे ये चादरे आब 
दूर तक फैली हो जैसे चादरे महताब

आखरी पन्ना कोरा रह गया 
पूरी न हो पाई एक किताब

होगी तब होगी उनसे मुलाकात 
क्यों रहने लगे हो इतने बेताब

ज़ुबाँ तक आकर रह गयी बात
दिल में ही दबे रह गये ज़ज्बात

उड़कर आकाश छूने की हसरत है
इश्क़ में है एक ऐसा उन्माद

जिसकी जुस्तजु थी पूरी हो गयी
सितारें कहते है उसे महताब

किशोर कुमार खोरेंद्र
(चादरे आब-पानी की सतह ,चादरे महताब-चाँदनी का फर्श ,ज़ज्बात -भाव ,
हसरत -इच्छा ,जुस्तजु-खोज महताब-चाँद )

कोई टिप्पणी नहीं: