रविवार, 26 अक्तूबर 2014

824-मुकद्दस

मुकद्दस

डालियों पर पीले पीले फूल खिले 
सूर्यमुखी सा ज़रा धूप को आओं जीले

तुम शादाब ज़मीं हो मैं नीला आसमाँ
उफ़ुक पर दो लकीरों सा हम आ मिले

मुकद्दस दीऐ सा जब वो सतत जलने लगे 
पत्थर की मूर्तियों ने अपने नयन खोल दिऐ

प्रगाढ़ अनुराग का भला उम्र से क्या वास्ता
रूह सा ख़त्म नही होते प्यार के सिलसिले

लौट कर आती नही मोहब्बत की नदी
इंतज़ार मे मुहाने पर हम खड़े हुऐ दिखे

किशोर कुमार खोरेंद्र

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