रविवार, 26 अक्तूबर 2014

821-झरोखा"

"झरोखा"

तुमने समझा हवा का वो एक तेज झोका था
तुम्हारे बालो को छूने का वो एक मौका था

कमरे मे सन्नाटा सा पसर गया था
तुमने न जाने तब क्या क्या सोचा था

खिड़कियो की आँखे खुली थी परदा सहमा सहमा था
फड़फड़ाते पन्नो की पीठ पर मैने कुछ लिख छोड़ा था

आईने के सामने जब तुम खड़े हुऐ थे
गौर से मैने तुम्हे सँवरते हुऐ देखा था

न तुमने मुझसे कुछ पूछा था न मैने तुमसे कुछ कहा था
मेरा दर्द भरा एक गीत तुम्हारी रगो मे बिजली सा दौड़ा था

जब तुम उदास मन से लौट रहे थे तब सीढ़ियाँ खामोश थी पंखा ठहर गया था
दो मुस्कुराते हुऐ चेहरो की आँखो ने बड़ी मुश्किल से अपने अश्को को रोका था

वस्ल और हिज्र के मिलन का ये कैसा मंज़र था
दर्शक सिर्फ़ वहाँ तेरे मेरे मन का एक ही झरोखा था

किशोर कुमार खोरेंद्र

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