रविवार, 26 अक्तूबर 2014

813-"कली "

"कली "

उसने कहा मेरे लिए भी लिखो ग़ज़ल 
समय को काफ़ी वक्त लगा ढलने में ग़ज़ल 

इस दरम्यान वह रूठ कर कहीं चली गयी 
दिल के आईने से न पाया पर मैं उसकी परछाई बदल 

कभी शब्द नहीं मिले कभी तुक नही मिला 
खाक छानते रहा मुझे ढहा मेरे सपनो का महल 

दिन में एक बार फिर कहा महीने मे एक दफे मिलना
दुर्लभ हो गया उससे अब मेल जो कभी था सरल

खूबसूरत लगती है दूर शिखर पर जमी हुई बरफ
कोहरे से घिरी रही तुम देख न पाया तेरा रूप असल

सांझ के सूरज की तरह तुम भी खो गयी कहीं
खिलने से पहले मेरे ख्यालों की कली दी गई मसल

किशोर कुमार खोरेंद्र

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