रविवार, 26 अक्तूबर 2014

812-"नदी "

"नदी "

आँसुओं से तर लगती है नदी 
रेत के नीचे बहती है एक और नदी 

वो विशाल वृक्ष कितना तन्हा है 
उम्मीदों के पक्षी रहते है वहीं 

मुझसे खुद को अलग न समझ 
मेरे ख्यालों से तू जाएगी नहीं कभी 

तेरे दर्द से भींग गयीं मेरी आँखें
प्यार इसे ही तो कहते है सभी

तू इस तरह से मायूश न हो
तुझमे ही है एक राह नयी

किनारे तक तेज लहर फिर आएगी
मंझधार में एक नाव फिर आज फँसी

किशोर कुमार खोरेंद्र

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