शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

809-दर्पण"

दर्पण"

तुम स्निग्ध चाँदनी की अंतिम किरण हो 
शीतल भोर की पहली सुनहरी किरण हो

मेरे इंतज़ार में छाँव सी ठहरी रहती हो 
मेरे मन के धूप का इंद्रधनुषी चित्रण हो

उन्मत लहरों सा आती जाती रहती हो 
मेरे सपनों के तट में करती विचरण हो

मेरी तन्हाई जिसका करती अनुसरण है
रेत पर वो पद चिन्ह छोड़ जाती हो

सिर्फ़ तुम ही मेरी सच्चाई से अवगत हो
जिसके सम्मुख विदेह हूँ तुम वो दर्पण हो

मैं खींचा चला जा रहा हूँ जिसके तीव्र सम्मोहन में
सितारो के आभूषणों से अलंकृत तुम वो आकर्षण हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (06-10-2014) को "स्वछता अभियान और जन भागीदारी का प्रश्न" (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

madhu singh ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u mayank ji

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u madhu ji