शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

848-शायद "

शायद "

ऐसा रोज क्यों लगता है 
की
मैं तुमसे आज पहली बार मिला हूँ 
तुम आज सुबह सुबह ही फूल बन कर खिली हो 
मैं आज ही भँवरा बना हूँ 
और शाम होने के पहले 
पूरे दिन में 
हम दोनो को एक दूसरे को पा लेना है

तुम मुझे हर क्षण नयी नयी सी क्यों लगती हो
कभी सागर से निकलते सूरज की तरह
कभी पहाड़ के पीछे
गुम हो जाती अंतिम किरण की तरह
कभी सितारों से घिरे
उस चमकते चाँद की तरह

शायद यह सोचकर की
कही आज का दिन आखरी न हो
तुमसे दुबारा मिलने का फिर
अवसर मिले न मिले

किशोर कुमार खोरेंद्र

847-"प्रतीक "

"प्रतीक "

तेरी आँखों में कशिश है 
मेरा मन भी रसिक है

तेरे ओंठ पंखुरियों से गुलाबी है 
मुझमे भी प्यास अधिक है

तेरे मन दर्पण में मेरी ही छवि उभर आई है 
मेरी चेतना मे गूँजता तेरा नाम अत्यधिक है

रूबरू मिल नही सकते दोनो
प्रेम में चिर विरह शरीक हैं

तन से तन का मिलन प्यार नही कहलाता
दो आत्माओं का मिलन प्रेम का प्रतीक है

किशोर कुमार खोरेंद्र

846-लौ

लौ

जीने के लिए तुम्हें याद करता हूँ 
गम ए जाना से फर्याद करता हूँ

तन्हा ही जलता हैं अंधेरें में चराग़ 
तन्हाई में लौ सा तुमसे संवाद करता हूँ

सफ़ीना कोई एक डूबने को है 
भव सागर से प्रतिवाद करता हूँ

उलझ गयी हैं तितलिया काँटों में
अंतरात्मा से वाद विवाद करता हूँ

खिलते है जब ह्रदय में अनुराग के कमल
शबनमी मौन का कविता में अनुवाद करता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

845-"हीरे का नग"

"हीरे का नग"

तुम मुझसे हो अलग रहे हो 
बेवफा से क्यों लग रहे हो

कहे थे कई जन्मों तक साथ रहोगे 
फिर मुझसे दूर क्यों भग रहे हो

मेरा गुनाह क्या है बता दो ज़रा 
मुझे याद कर क्यों जग रहे हो

तेरे दर पर दीये सा जलता रहा
मेरी इबादत को क्यों ठग रहे हो

कविता नज़्म ग़ज़ल किस पर लिखूंगा
तुम तो मेरी शायरी में हीरे का नग रहे हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

844-"कुछ भी नही "

"कुछ भी नही "

जब मैने तुम्हें
गौर से देखा
तो तुम्हारी 
आँखों की खामोशी ने 
मुझसे यह बात कही

तुम मेरी कविता हो
और मैं हूँ तेरा कवि

मैं इतराता बादल हूँ
तो
तुम भी तो हो
एक शोख नदी

सागर सा
तुम्हारे हृदय में भर चुका हूँ
संभल कर चलना
कही छलक न जाए
तुम्हारे मन की
प्यार के अमृत से
भरी गगरी

मैं तुम्हारे
नाम से मिट चुका हूँ
मेरा अस्तित्व
तुम्हारे वजूद में मिल चुका है
मेरे भाव तुममे विलीन हो चुके हैं
शेष अब मुझमे
बस तुम्हारी
आराधना ही रही

तेरा अलौकिक रूप
निहारने को तरस रहा हूँ
तू कब तक रहेगी
बनकर परदानॅशी

अपनी रूह के नूर की
नजम को
मेरी निगाहों मे
आकर पढ़ लो
मैं तुम पर
अब लिखी हुई
एक किताब के सिवा
और कुछ भी नही

किशोर कुमार खोरेंद्र

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

843-प्रणय कथा.....

प्रणय कथा.....

तेरी हँसी की गूँज मेरे मन मे है बसी 
जैसे झरने की सदा वन में है बसी

तेरे मुस्कुराते ही खिल उठते हैं सारे उपवन 
तेरे हुश्न की हर अदा मेरे नयन में है बसी

मेरी यादों में तुम खुश्बू सा छाए रहते हो 
मेरी हर संगीन खता तेरे दामन में है बसी

तुम्हें भूल सकता हूँ यह सोच भी नही सकता
हमारी प्रणय कथा मेरी धड़कन में है बसी

अटूट होता है प्रेम का यह अद्र्श्य सरस बंधन
प्यार की उमड़ आई घटा मधुर चिंतन में है बसी

किशोर कुमार खोरेंद्र

842-"मोहब्बत "

"मोहब्बत "
ये प्यार है या कोई इबादत
तुम्हें न भूलने की मुझे है आदत
रास्तों के काँटों को चुनता हूँ
हसरत है तुम सदा रहो सलामत
तुम्हारी सोहबत मिली नहीं कभी
ख्वाब मे ही आओ यही है मेरी चाहत
गर्दिश के आकाश का एक तारा हूँ
तेरी दुआ करती है मेरी हिफ़ाज़त
सीने मे एक काँटे सा चुभ गये हो
ये मोहब्बत है या कोई अदावत
किशोर कुमार खोरेंद्र

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

841-"गुस्ताख़ी "

"गुस्ताख़ी "
आज पन्ना है सहमा हुआ 
डरा स्याही का क़तरा हुआ

गम ए इश्क़ आ सीने से लग जा ज़रा 
दिल को आघात बहुत गहरा हुआ

प्यार का महासागर सूख गया है 
दूर दूर तक मंज़र अब सहरा हुआ

उन्हें इस बात की खबर ही नहीं हैं
बोलने का रूखा उनका लहज़ा हुआ

सजदा करने जाउँ तो किधर जाउँ
रुख़ उन्होने अब है अपना फेरा हुआ

फिर से अपना ले मुझे ऐ पाक नदी
साहिल पर तेरे हूँ अभी मैं ठहरा हुआ

गुस्ताख़ी हुई है मुझसे ज़रूर कोई न कोई
मान लो गुनाह मुझसे आज यह पहला हुआ

चाँद से रूठ गयी है चाँदनी फिर से
मालूम नही रौशन कब सवेरा हुआ

किशोर कुमार खोरेंद्र

(सहरा =रेगिस्तान ,रुख़ =चेहरा ,सजदा =माथा टेकना साहिल =किनारा गुस्ताख़ी = ग़लती )

840-'न्योंछावर"

'न्योंछावर"

ख्वाब सा तेरा आना फिर चले ज़ाना
मैं तो बन गया हूँ एक अफ़साना

वो कौन है लोग पूछने लगे हैं
जिसका हो गया हूँ मैं दीवाना

वो कोई और नहीं ,है मेरी एक कल्पना
तलाश लिया है मैने ,जीने का बहाना

मुझमे रोज खिलते है भावनाओं के गुलाब
सीख लिया हूँ उन्हे चुनकर हार् बनाना

मैं खुद से कब तक कैसे प्यार करुँ
जी चाहता हैं तुम पर न्योंछावर हो ज़ाना

किशोर कुमार खोरेंद्र

839-"करार "

"करार "

तुम मुझसे कभी न होना बेजार 
फिराक के नज़र न आये आसार

मेरी निगहीँ के भीतर तुम रहते ही हो 
मन की आँखों से भी कर लेता हूँ तेरा दीदार

जब तक हम दोनों के दरमियान है प्यार 
घूमती रहेगी धरती रहेगा यह संसार

ख्वाब है गर यह दुनियाँ तो
सपनों मे आओ करे करार

मुझे तो आजकल नींद आती नही
तुम भी तो रहने लगे हो बेदार

किशोर कुमार खोरेंद्र

{बेजार =विमुख ,फिराक =वियोग ,आसार =लक्षण ,दीदार =दर्शन ,दरमियाँ =बीच ,करार =वचन ,बेदार =जाग्रत ,सचेत }

838-"शायरी "

"शायरी "

मेरी शायरी मे तेरा ही ज़िक्र है
तेरी ही याद है तेरी ही फ़िक्र है

कह तो दिया मैने मुझे तुमसे मोहब्बत है
इश्क़ का मतलब कई जन्मो तक ग़मे हिज्र है

तहरीर ऐ अहसास बिना शब्दों के होते है
कोरे पन्नों से बनी इबादत की जिब्र है

मेरी हथेली की इक लकीर पर तेरा नाम लिखा है
तुम आख़िर मिल ही गये तू ही अभिन्न मित्र है

देखता था जिसे ख्वाबों मे जिसे सोचता था मन में
हूबहू तेरे चेहरे जैसा ही उस अजनबी का चित्र है

रास्तों को मालूम नही जाना कहाँ किधर है
जीवन के इस सफ़र मे करना मुझे अब सब्र हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

837-"वाकिफ़ "

"वाकिफ़ "

दीवारों से ,काँच की खिड़कियों से डर है
दरवाजे से तेज हवा न आ जाए डर है

तुमसे कहना बहुत कुछ चाहता है मन
तुम पर कोई तोहमत न लगा दे डर है

गुमनामी में खोई रहती है हम दोनों की मोहब्बत
मासूम हसरतो के कहीं पंर न निकल आये डर है

मैं इस जहाँ मे अजनबी की तरह ही रहता हूँ
किसी मोड़ पर तुमसे फिर भेंट न हो जाए डर है

मैं करता हूँ रोज तेरी ही पूजा और इबादत
इस बात से दुनियाँ वाकिफ़ न हो जाए डर है

किशोर कुमार खोरेंद्र

836-"विस्तार "

"विस्तार "

तुम्हारे दवारा दिल से
तारीफ किए गये
आईने के काँच में
मैं और खूबसूरत
लगाने लगी हूँ

मेरी आँखे तुम्हें
कमल की पंखुरियों
की तरह लगती हैं
मेरे होंठ
और गुलाबी हो गये हैं

मैं पानी सा
पसरती जा रही हूँ
तुम मुझे
रेत की तरह
आत्मसात
करते जा रहे हो

मैं कहाँ से लाउँ
इतना प्यार
जो पा सके
तुम्हारे प्रेम के अनुरूप
सहारा के मरुथल जितना विस्तार

तुम मुझे परत दर परत
छिलते जा रहे हो
मैं अपने मन
अपनी रूह को
तुम्हारे हवाले कर चुकी हूँ

तुम मुझे खोजो
मैं तुम्हारी रगों में
महा नदी सी बह रही हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

835-"इज़हार"

"इज़हार"

सचमुच में हूँ तुझपे मैं निसार 
निभा नहीं रहा हूँ कोई किरदार

ख्वाबों में तुम हो ख्यालों में तुम ही हो 
तुमसे प्यार करने का हैं मुझे अधिकार

यूँ तो ये जिंदगी तन्हा भी बीत जाती 
साथ होकर किया हैं तूने मुझ पर उपकार

तुम्हारे मन में अजल से रहता आया हूँ
सिर्फ़ नहीं हूँ मैं एक तसव्वुर खुशगुवार

आरंभ से तेरी ही जुस्तुज़ू थी तेरी ही आरजू थी
जहाँ में उस मोब्बत का कर रहा हूँ तुमसे इज़हार

किशोर कुमार खोरेंद्र

{निसार =मुग्ध ,क़ुर्बान , किरदार =पात्र ,अजल =आदि ,तसव्वुर=ध्यान ,विचार ,
खुशगुवार = मनोवांछित,रुचिकार ,जुस्तुज़ू=तलाश ,आरजू=कामना , इज़हार =प्रगट करना }

834-चिंगारी "

चिंगारी "

बंद आँखों से तुम दिखाई देती हो 
चुप रहती हो पर सुनाई देती हो

राहबर से लगते हैं दूर तक फैले जुगनुओ के कतार 
अपनी आँखों से मेरी आँखों में चिंगारी बो जाती हो

रोज रोज देखे गये ख्वाब ही तो एक दिन सच होते हैं 
सपनों के तिनको से नीड का निर्माण कर जाती हो

शिखर को छूने आख़िर झुक ही जाता है आस्मा
प्रेम की उँचाई पर एक सितारे सा जगमगाती हो

मिलना और बिछुड़ना तो एक सिलिसिला है
हर जनम मे मुझसे इसीलिए मिलने तुम आती हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

833-"प्रेरणा "

"प्रेरणा "

मैं चेतन हूँ तुम हो मेरी चेतना 
जीने की तुम हो मेरी प्रेरणा

अंजुरी में गंगा जल सी भरी हो 
बंद आँखें चाहती हैं तुम्हें ही देखना

लहरें आ आ कर फिर लौट जाती हैं 
रेत पर लिख जाती हैं विरह की वेदना

जेठ की धूप सा चुभने लगते हैं पल
जब तुम करती हो मेरी अवहेलना

सूनी अमराई में मधुमास सी आ जाओ
अधर चाहते हैं बाँसुरी पर मधुर तान छेड़ना

किशोर कुमार खोरेंद्र

832-"अनुराग "

"अनुराग "

दिन में रहते हो तुम साथ मेरे आफताब से
रात मे रहते हो तुम साथ मेरे महताब से

तुम्हें भेजे गये खतों को बार बार पढ़ रहा हूँ
तन्हा रह गया हूँ अब तक न मिले जवाब से

तुम प्यार का आठवाँ गाड़ा रंग हो
जिसे देखता हूँ अक्सर अपने ख्वाब से

तुमसे रूबरू मिला नही हूँ कभी
मन में रोज खिलते हो पर गुलाब से

तुमसे मिलकर ही चैन आएगा
करार नहीं पढ़कर तुम्हें किताब से

बरफ बादल शबनम कोहरा इंद्र धनुष
इनसे भी ज़्यादा लगते हो तुम मुझे नायाब से

ज़िक्र होता हैं जब भी तुम्हारा
खिल आते हो कमल सा तालाब से

दीए सा जलता रहता हूँ निरंतर तेरी याद में
शमा सा पिघलते रहता हूँ तुम्हारे अनुराग से

किशोर कुमार खोरेंद्र

831-"वफ़ा "

"वफ़ा "

इस किनारे मैं उस किनारे तुम रहे 
तेरे मन में मैं मेरे हृदय में तुम रहे 

सावन में जब उफ़न कर उमड़ आई नदी 
बिछुड़ें हुऐ लहरों सा हम दोनों मिलते रहे 

बहारों का जब जब मौसम आया 
एक ही टहनी पर फूलों सा खिलते रहे 

रात में जब घना तम छाया
दो सितारों सा जगमगाते रहे

कोयल जब अमराई मे गाने लगी
फागुनी बयार सा महकते रहे

प्रेम को जीकर इसी तरह से
वफ़ा जन्मों तक निभाते रहे

किशोर कुमार खोरेंद्र

830-'पूजा"

'पूजा"

तुम मुझसे कहाँ जुदा हो 
तुम तो मेरे अब खुदा हो

दरिया सा तेरी ओर बह रहा हूँ 
तुम्हारी यादें मेरी राहनुमा हो

तुम हंसते हो तो कमल खिलते हैं 
वस्ल का वो एक मकाम खुशनुमा हो

एक तारा मुझे ताकता रहा भोर तक
रूहे नूर की तरह तुम मेरी महबूबा हो

चंदन के धुवें से घिरा रहा हवन
आत्मा के मंदिर की तुम पूजा हो

किशोर कुमार खोरेंद्र

829-"सुरूर "

"सुरूर "

तेरी आँखों में हैं सुरूर 
तुझे प्यार हुआ है ज़रूर 

तेरी पलके खुलती है तो सूरज उगता है 
मेरी राहो में बिछा है नूर ही नूर 

तेरी खामोशी में बेहद असर हैं 
मेरे ग़ज़ल हो रहे हैं मशहूर 

तू साए की तरह मेरे साथ है
मुझे अपनी तन्हाई पर है गुरूर

तू कोहरे सा आकर चली जाती है
मेरे पास तेरे वजूद का नहीं है कोई सुबूत

मै जी रहा हूँ एक तसव्वुर को
लोग कहते हैं इसे इश्क़ का जुनून

किशोर कुमार खोरेंद्र

828-घना सहारा

घना सहारा 

चाँद सा जिसका सुंदर चेहरा है 
उसकी चाँदनी ने मुझे आ घेरा है 

हर तरफ उजाला सा लगता है 
वहाँ का छट गया अंधेरा हैं 

रात भर सपनों में तारो सा जगमगाते हो 
मेरे ख्यालों मे तेरी यादों का सुनहरा सवेरा है 

घोसलें में शाम होते ही लौट आते हैं जैसे पंछी
मेरा हृदय भी तेरे इंतज़ार का रैन बसेरा हैं

बहारों के मौसम सा लगाने लगा हैं हर एक पल
अपने अपने दिल पर अधिकार अब रहा न तेरा न मेरा हैं

पेड़ के नीचे छाँव ठहरी रहती हैं जैसे
तेरी पलकों में मेरे लिए घना सहारा हैं

किशोर कुमार खोरेंद्र

827-"कश्मकश "

"कश्मकश "

उनकी नफरत में भी प्यार बहुत छुपा हुआ था 
दर्द अब तक है जो एक कांटा गहरा चुभा हुआ था 

रोज फूल सा खत मिलते रहने पर 
उल्फत की सादगी को गुमाँ हुआ था 

देह से होकर जाती है रूह तक इक राह 
धरती को चूमने के लिए आकाश झुका हुआ था 

वो चाहते है की मोहब्बत बदनाम न हो
रूबरू जब भी मिला फसिले पर रुका हुआ था

हिज्र की तन्हाई में इसी तरह सदियाँ बीत गयी
पाप पुण्य के दोराहे पर कश्मकश ऊबा हुआ था

प्यार करने को भी लोग गुनाह कहते है
ये पहेली भी जो हल कभी न हुआ था

किशोर कुमार खोरेन्द्र

826-प्रेम कहानी "

"प्रेम कहानी "

मेरी मोहब्बत और तेरी पशेमानी
ग़ज़ल के पीछे है यही एक कहानी

जग वालों मुझ पर यूँ न हंसा करों 
तुम्हारी आँखों में भी भरा हैं खारा पानी

आख़िर पहुँच ही जाती है सागर तक नदी 
कहाँ से आती है उसमे पुरजोश रवानी

मिल ही जाती हैं कभी न कभी नज़रों से नज़रें
जल उठता है तब भीतर एक चिराग रूहानी

तुझे मालूम नहीं की मैं ही हूँ तेरा दीवाना
मुझे मालूम नहीं की तू ही है मेरी दीवानी

बयाँ किसी ने नहीं किया आज तक ,बस
किताबों में पढ़ते हैं मनगढ़न्त प्रेम कहानी

किशोर कुमार खोरेंद्र

{पशेमानी=संकोच,लज़्ज़ा}

825-"महताब "

"महताब "

आजकल लगती है मुझे ये चादरे आब 
दूर तक फैली हो जैसे चादरे महताब

आखरी पन्ना कोरा रह गया 
पूरी न हो पाई एक किताब

होगी तब होगी उनसे मुलाकात 
क्यों रहने लगे हो इतने बेताब

ज़ुबाँ तक आकर रह गयी बात
दिल में ही दबे रह गये ज़ज्बात

उड़कर आकाश छूने की हसरत है
इश्क़ में है एक ऐसा उन्माद

जिसकी जुस्तजु थी पूरी हो गयी
सितारें कहते है उसे महताब

किशोर कुमार खोरेंद्र
(चादरे आब-पानी की सतह ,चादरे महताब-चाँदनी का फर्श ,ज़ज्बात -भाव ,
हसरत -इच्छा ,जुस्तजु-खोज महताब-चाँद )

824-मुकद्दस

मुकद्दस

डालियों पर पीले पीले फूल खिले 
सूर्यमुखी सा ज़रा धूप को आओं जीले

तुम शादाब ज़मीं हो मैं नीला आसमाँ
उफ़ुक पर दो लकीरों सा हम आ मिले

मुकद्दस दीऐ सा जब वो सतत जलने लगे 
पत्थर की मूर्तियों ने अपने नयन खोल दिऐ

प्रगाढ़ अनुराग का भला उम्र से क्या वास्ता
रूह सा ख़त्म नही होते प्यार के सिलसिले

लौट कर आती नही मोहब्बत की नदी
इंतज़ार मे मुहाने पर हम खड़े हुऐ दिखे

किशोर कुमार खोरेंद्र

823-"मंझधार"

"मंझधार"

बिना शब्दों के तुझे लिखने लगा हूँ 
क्षितिज से मै तुझे दिखने लगा हूँ

शमा बनकर तू जल उठी है 
मै परवाने सा मिटने लगा हूँ

जगमगाती सड़कें रात भर खामोश ही रहे 
टिमटिमाते तारों के कहने पर चलने लगा हूँ

झील की सतह पर चाँद उतर आया है
तेरी आँखों में परछाई सा उभरने लगा हूँ

दर्द के सागर से यादों की एक तेज लहर आई है
साथ साथ उसके अब मैं मंझधार में बहने लगा हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र

822-"ख्याल"

"ख्याल"

पेड़ भी रात भर सोचते होंगे
पत्ते मेरे बारे में बोलते होंगे


सितारे दूर आकाश से मुझे देखते हैं
रात के सन्नाटे मेरे साथ जागते होंगे


सरसराती हुई आती है ठंडी हवा
कोहरे मेरे छत पर टहलते होंगे


शबनम की बूँदो से नम हो जाता है आँगन 
जाते जाते सपने पैरो के निशाँ छोड़ते होंगे


दरवाजे खिड़कियाँ पर्दे मेरे साथी है
पंखे मेरे ख्यालों के साथ घूमते होंगे


यह सोच कर की मुझसा कोई दूसरा भी है
चाँद के संग बादल मन मे मेरे झाँकते होंगे


किशोर कुमार खोरेंद्र

821-झरोखा"

"झरोखा"

तुमने समझा हवा का वो एक तेज झोका था
तुम्हारे बालो को छूने का वो एक मौका था

कमरे मे सन्नाटा सा पसर गया था
तुमने न जाने तब क्या क्या सोचा था

खिड़कियो की आँखे खुली थी परदा सहमा सहमा था
फड़फड़ाते पन्नो की पीठ पर मैने कुछ लिख छोड़ा था

आईने के सामने जब तुम खड़े हुऐ थे
गौर से मैने तुम्हे सँवरते हुऐ देखा था

न तुमने मुझसे कुछ पूछा था न मैने तुमसे कुछ कहा था
मेरा दर्द भरा एक गीत तुम्हारी रगो मे बिजली सा दौड़ा था

जब तुम उदास मन से लौट रहे थे तब सीढ़ियाँ खामोश थी पंखा ठहर गया था
दो मुस्कुराते हुऐ चेहरो की आँखो ने बड़ी मुश्किल से अपने अश्को को रोका था

वस्ल और हिज्र के मिलन का ये कैसा मंज़र था
दर्शक सिर्फ़ वहाँ तेरे मेरे मन का एक ही झरोखा था

किशोर कुमार खोरेंद्र

820-"प्रतिमा "

"प्रतिमा "

इस जहाँ मेँ जब भी आता हूँ 
तुम्हें ही तो मैं गुनगुनाता हूँ

दूर दूर तक फैला है खारा सागर 
यादों की मीठी लहर सा लौट आता हूँ

मेरे मन मंदिर की तुम प्रतिमा हो 
अखंड जोत सा जलता जाता हूँ

डूब जाता है जब घाटियों के पीछे सूरज
तन्हाई की झील मे चाँद सा उभर आता हूँ

अंतहीन होती है प्यार की कहानी
मैं तुमसे कभी कहाँ मिल पाता हूँ

किशोर कुमार खोरेंद्र