शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

807-"प्रीत की डोरी "

"प्रीत की डोरी "

तुम्हारे और मेरे बीच
उदगम से सागर जितनी
यह कैसी है दूरी

रास्ते कहते है
चलते रहो
नदियाँ कहती है
संग मेरे
बहते रहो
बिना पंख कैसे उडू
तुमसे मिलवाने की
हवा की साध
रह गयी है अधूरी

एक दूसरे के मन में
हम है समाए
दोनों की नज़रों ने
की है
एक दूसरे की छवि
की चोरी

मौन के धागों से
गुँथी हुई है
अद्र्श्य सी
तुम्हारे ह्रदय से
मेरे हृदय तक
प्रीत की डोरी

किशोर कुमार खोरेंद्र