शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

805-"साँसों की लय पर "

"साँसों की लय पर "

इस पृथ्वी से
इस आकाश से
इस अंतरिक्ष से
बड़ा और व्यापक है
ब्रम्‍हांड का सूनापन

इस सुनेपन से
ज़्यादा विशाल है
मेरी अंतरात्मा
का अकेलापन

जिसकी खामोशी से
घिरा रहता है
मेरा तन्हा मन

ऐकांत के इस महासागर
की लहरों के बीच
बिना पतवार के
शब्दों से बनी नाव में
कर रहा है
मेरा मैं भ्रमण

चाँदनी सा
स्निग्ध है वातावरण

साथ में मेरे
न परछाई है न दर्पण

न गंतव्य का पता है
न कोई
देने वाला है मार्गदर्शन

खुद का करता हूँ
अकेले में अध्यन

मन के कोरे पन्नों में
फिर
करता हूँ उसका लेखन

हिचकोले खाती है नाव
आती जाती
लहरों के कारण

तरंगों के अनुरूप
गूँजती है
मेरे भीतर
मेरे हृदय की धड़कन

मेरा पीठ थपथपाती है
यही स्पंदन
जिसका मै
किया करता हूँ अनुगमन

साँसों की लय पर
आधारित है
मेरा यह जीवन

किशोर कुमार खोरेंद्र

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