गुरुवार, 4 सितंबर 2014

804-परख "

परख "

तुम हो सब्जी में डली
तीखी मिरच
मैं हूँ सादे दाल का
फिका नमक

तुममे सुहागन की
रंगीन चूड़ियों सी
हैं खनख
मुझमे है
खाली सुराही
सी ठनक

तुम बहुमूल्य जैसे
हो कनक
मेरे वयक्तित्व में
उतनी नहीं है दमक

तुम्हारे चेहरे पर
है रौनक
मैं हूँ
एक दयनीय सा
आवारा सड़क

तुम्हारे आसपास है
जहाँ की तड़क भड़क
मैं हूँ जंगल के मौन का
एक उपासक

तुम्हारे पायल में
क्यों हैं इतनी झनक
मुझे उसके आशय की
किंचित भी
नहीं है परख

किशोर

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