गुरुवार, 4 सितंबर 2014

803-'आत्मसात'

'आत्मसात'
मेरे अभिमंत्रित अक्षरों को
क्यों नहीं
पाते हो जोड़

मेरे सजीव शब्दों को
लिखते लिखते
आधे में ही
देते हो छोड़

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम
निश्छल हैं और निर्दोष

तुम्हारे इंतज़ार में
ऊँचें सागौन के
एक वृक्ष सा
खड़ा रहता हैं
मेरे निष्कलंक
जीवन का हर मोड़

कभी कभी
कोरे पन्नों पर
अनलिखे छंदों सा
रह जाती हूँ
हो जाते हो
जब मुझसे विमुख
और कठोर

भूल कर मेरे उदगार
तुक मिलाने के लिए
व्यर्थ ही करते हो जोड़ -तोड़

मुझमे जो करुणा हैं
प्रेम ,स्नेह ,ममता हैं
उन भावो को आत्मसात कर
लिखो काव्य
और सभी के ह्रदय को
करो कवि भाव -विभोर

मेरी गरिमा का
रखना ख्याल
मैं तुम्हारी ही अंतरात्मा
की प्रतिछाया हूँ
नहीं हूँ कोई और

सूरज मेरे माथे पर
बिंदी सा ऊग आता हैं
स्वर्णीम वस्त्र
पहनाता हैं मुझे भोर

देखकर गरीब की कृष काया
लोग कहते हैं
यह है प्रकृति की माया
लेकिन इसका मूल कारण हैं
मनुष्य के मन में निहित लोभ

करो कवि
अपनी लेखनी से तोड़ फोड़
और शब्दों के द्वारा नूतन विस्फोट
और मानव की सुप्त चेतना को
दो तुम झकझोर

किशोर

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