गुरुवार, 4 सितंबर 2014

802-"अकेलापन मेरा मित्र हैं"

"अकेलापन मेरा मित्र हैं"

कुछ किताबें
एक डायरी
एक कलम
एक कंप्यूटर
और मेरे कमरे की खामोशी
जहाँ एक पंखा घूमता रहता हैं
एक घड़ी बिना रुके
चलते रहती हैं
नए पुराने अखबारों के पन्ने
फड़फड़ाते रहते हैं
ये सब मेरे अकेलेपन के मित्र हैं
और अकेलापन मेरा मित्र हैं

कभी कभी हवा के तेज झोंको के साथ
आँगन में उगे हुए आम की
सूखी पत्तिया
रोशन दान से मेरा हालचाल पूछने
मुझ तक आ जाती हैं
कभी कभी
वर्षा की कुछ बूँदें रास्ता भटक कर
मेरी मेहमान नवाजी स्वीकार लेती हैं

खिड़की के उस पार -
जहां तक मेरी दृष्टी जाती हैं
उन दिखायी देने वाले दृश्यों को मैं
अपनी कविताओ में लिखता ही रहता हूँ

मेरे अकेलेपन के घर में
जहाँ मैं मूल रूप से निवास करता हूँ

मेरी साँसे हैं
मेरा मन हैं
मेरी आत्मा हैं
मेरी परछाई हैं
मैं रक्त सा -
अपनी नसों में बहता हुआ
इन सबसे रूबरू
मिलता ही रहता हूँ

मेरे अकेलेपन के घर में
यादो का एक गुप्त कोना भी हैं
जहां बैठ कर मैं तुम्हे
याद कर लिया करता हूँ
कभी कभी रो भी लिया करता हूँ

तुम्हारे पास वक्त नहीं था
इसलिए मैं पीछे छूटता गया
और तुम बहुत आगे निकल गयी
मेरी पहुँच से बाहर

मैं अपने अकेलेपन के साथ
खुश हूँ ,संतुष्ट हूँ
क्योंकि वह मेरी बातों को
ध्यान से सुनता हैं
मेरे दर्द को महसूस करता हैं
कम से कम मैं
इतना तो जानता हूँ की
मेरी तन्हाई मुझे तन्हा छोड़कर
कभी नहीं जायेगी
किशोर

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