गुरुवार, 4 सितंबर 2014

801-फ़ासिला

फ़ासिला

मन के तार
झंकृत होते है
तो वे
पुकारते हैं
तुम्हारा ही नाम सदा
तुम्हारे और मेरे बीच हैं
फ़ासिला और
छाया हैं कोहरा घना
तुम्हारी धूमिल सी
परछाई को
अपने सीने से लगा रखा है
मेरी निगाहों का आईना
प्यार में सिर्फ जुदाई हैं
और है
बेकरारी की यंत्रणा
वफाए इश्क़ मे
मोम की तरह
धीरे धीरे गलकर
होना पड़ता है फ़ना
तुम्हारे बगैर बहार भी
लगती है ख़ज़ाँ
खतागार नहीं हूँ
मिल रही है मुझे
पर खुशनुमा सजा
तुम्हारे दर तक
कभी पहुँच न सका
छोड़ चुका हूँ पर
तुमसे मिलने की आश में
मै कबसे अपना कदा
तुमसे मोहब्बत करता हूँ
इसलिए
हो गया हूँ गर्दिश जदा
जानता हूँ
एक दिन वह भी आयेगा
जब मान मर्यादा के
नाम पर
मुझे तुम
अपने शहर तक से
रेल की तरह
गुजरने से भी कर दोगी मना



kishor 

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