गुरुवार, 4 सितंबर 2014

800-दोस्ती

दोस्ती
मेरे मन के
कोरे कागज़ पर
उभर आया हैं
तुम्हारा अक्स

ह्रदय में जाग उठे
सुकुमार भाव को व्यक्त
करने के लिए नहीं
मिल रहे हैं शब्द

इस जहां के महासागर में
तिनके की तरह
बहते बहते
मिल गयी हैं
तुमसे मेरी किस्मत

एक दूजे से
हम दोनों है अनुरक्त
बन गए है
आपस में सच्चे दोस्त

अजनबी और अनाम से
इस रिश्ते को
परिभाषित नहीं
कर पा
रहा है रक्त

इस जग में
दो अपरिचित व्यक्ति
इस तरह से
एक हो सकते हैं
अपने इस अडिग फैसले पर
खुद वक्त है स्तब्ध

उसकी अंतरात्मा मेरे लिए
मेरी अंतरात्मा उसके लिए
असीम स्नेह से
आखिर क्यों है युक्त

शब्दों के बिना भी
हमारी खामोशियाँ
कर लेते हैं
आपस में बातचीत समस्त

लगाव के इस अनुपम ,सरस
और अद्भुत
स्वरूप का
मनुष्य ही
हो सकता हैं अभ्यस्त

मेरी साँस पर
तुम्हारा अधिकार है
तुम्हारे हर धड़कन के जरिये
मैं ही
होता हूँ अभिव्यक्त

किशोर

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