गुरुवार, 4 सितंबर 2014

799-अपहरण

अपहरण

वही आनन
वही नयन
सुराहीदार गर्दन
अधरों पर
वही मनमोहक
मुस्कान का आकर्षण

जिसका मेरे सपनो में
अक्सर किया करता हैं
मेरा अचेतन प्रदर्शन

बांहों में भरकर
वही गर्मजोशी से भरा आलिंगन
गालों पर
वही मधुर मृदु चुम्बन
ख्यालों ने
जिसका किया है
प्राय; मुझसे वर्णन

तुम मेरे सपनो में हो
तुम मेरे ख्यालों में हो
जब से तुमने
मेरी नज़रों के द्वार से
मेरे जीवन के चौखट पर
किया हैं
अपना आत्मीय समर्पण

बिना सपनो के
बिना खयालों के भी
मुझे होने लगा हैं
तुम्हारे सुन्दर रुप का दर्शन

मेरे वजूद का
तुम्हारे अंत:करण ने
कर लिया हैअपहरण

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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