गुरुवार, 4 सितंबर 2014

798-प्रतीक्षा



प्रतीक्षा



मेरे मन के मृदु शब्द
जो
टूट कर बिखर गय
जैसे
गर्दिश के आकाश के
लुप्त हुए
तारे हो असंख्य

वे तुमसे कुछ
कहना चाहते थे
उनके एकजुट होने का
यही था मंतव्य
उन अनलिखे ,अनपढ़े ,अनसुने
शब्दों ने किया था
अपने अक्षरों में
तुम्हारे लिए
इंद्रधनुषी कामनाओं के
रंगों का संचय

तुम्हारे मन के
प्यार के सागर में
होना था उन
शब्दों का विलय

अब उन
समाधिस्थ शब्दों को
पुनर्जीवित करने के लिए
मेरी उम्र के पास
नहीं हैं समुचित समय

पर जिस मनन में
इन शब्दों का जन्म हुआ था
वह खूबसूरत चिंतन
रहेगा सदा अक्षय

उन शब्दों को खोकर
मेरे अनुभव ने
कुछ पाया ही है
नहीं हुआ हैं
सारगर्भित
भावों का अपव्यय
कुछ शब्दों में
मेरे ह्रदय की
अतल गहराई से
अभिव्यक्त हुए थे
तुम्हारे प्रति
प्रिय सम्बोधन मधुमय
कुछ शब्दों ने जुड़कर
सृजित किया था
ऐसा वाक्य
जिसमे था तुमसे
भेंट करने हेतु अनुनय

कुछ शब्दों का था
यही अभिप्राय
तुम्हारे आगोश में
मनुहार युक्त आश्रय

कुछ शब्दों कथन का
सीधे सीधे था
यही आशय
नैसर्गिक प्रांगण में
भ्रमर और कली सा
आओ करे
उन्मुक्त प्रणय

मेरे अचेतन के क्षितिज को
लांघकर
जो मेरी चेतना के
बने थे अवयय
वे कुछ शब्द थे
प्रकृति और पुरुष के
शाशवत सम्बंधों सा
गूढ़ और रहस्यमय

कुछ शब्द
इसलिए प्रयासरत थे
ताकि
तुम्हारे सुकुमार ह्रदय से
मेरे ह्रदय का
हो जाय
गहन परिचय
विरह काल के ये
सारे शब्द तुम तक
सम्प्रेषित नहीं हो पाय
उन चूर चूर हो चुके
शब्दों की आशा को
एकत्रित कर
पुन: तुम्हारे
सम्मुख ला पाने का
मेरे पास अब
नहीं हैं कोई उपाय
शायद किसी कारणवश
तुम्हें मुझ तक
पहुँचने में विलम्ब हो रहा हो
इसलिए वे सारे शब्द
मेरी अंतरात्मा के अंतरिक्ष के
शून्य में अंतर्ध्यान हो गय

खाली खाली सा मन लिए
वियोग के
अंतहीन पुल पर बैठा हूँ
इंतज़ार की घड़ियों सा
हो कर तन्मय

अब यदि तुम कभी आई
तो
मेरी ख़ामोशी के
मौन पर होगा
तुम्हे विस्मय
प्रतीक्षारत हूँ
मेरी चेतना में
आदि से अंत तक
तुम्हारा ही वर्चस्व हैं
कभी तुम
मेरी विराट कल्पना
बन जाती हो
कभी मेरे काव्य का
मुक्त
छंद या लय

जहाँ कही भी हो आओ
मैं ही हूँ
तुम्हारा गंतव्य
मेरी आत्मा ही है
तुम्हारा निवास आलय

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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