गुरुवार, 4 सितंबर 2014

797-"विचार"

"विचार"

सपनों में जागकर
तुम्हारे आगमन का
करता हूँ इंतज़ार

मेरे एकाकीपन के
रेगिस्तान में अंकित
तुम्हारे जाते हुए पदचिन्हों का
अमिट रहे आकार

तुम्हारी छवि का
पीछा करती है
मेरी दूर दृष्टि
महासागर की प्रचंड लहरों और
मेरी निगाहों के बीच
इसी बात पर
हो गयी है तकरार

मेरे मन के वन में
नीरवता की घनी डालियों सी
तुम छायी हो
मुझे तुमसे मिलने के
नज़र आ रहे है आसार

मैं हूँ तो तुम हो ही
तुम हो तो मैं हूँ ही
हम दोनों की
मिलनस्थली है
यह सँसार

तुम्हारे सौंदर्य को निहार कर
यह प्रकृति
करती आई हैं
अपना श्रृंगार

पूछता हूँ चांदनी से
क्या तुमने अपनी सखी को
आते हुए देखा है
क्षितिज के उस पार

निस्तब्ध है भोर का
सिंदूरी वातावरण
भ्रमवश
तुम्हारे कदमो की
सुनकर आहट
थम जाती है
मेरी धड़कनो की साँस
तुम बिन लगता है
यह जग
मुझे अब निस्सार

मैं यदि आत्मा हूँ
तो तुम हो परम आत्मा
आजकल
न जाने क्यूँ
मेरे मन मै आता है
यह विचार

किशोर

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