गुरुवार, 4 सितंबर 2014

796-"बांसूरी"

"बांसूरी"

तुम्हें मुझमें है
मुझे तुममे है
गहरी रूचि

इसलिए हम दोनों को
एक दूसरे से
प्यार करने की
है सूझी

तुम्हारे बिना
मैं रह नहीं सकता
मेरे बिना अब
तुम्हें भी लगती है
अपनी जिंदगी अधूरी

हम दोनों के ह्रदय की
सुकुमार भावनाएं
करना चाहती हैं
आपस में
दिल्लगी और ठिठोली
प्रेम जाल से घिर कर
जब से हम
आनंद से विभोर हुए हैं
अधरों पर देखो
कैसी सुहानी हँसी है छूटी

हमदोनो इस बात से
भिज्ञ है
की यह
न खेल है न अभिनय
एक दूजे को देखे बिना
हम दोनों हो जाते है दुःखी
मैं वृत्त हूँ तुम हो मेरी धूरी

सलामत रहे यह
अनुराग हममे सदा
मृत्यु भी न कर पाये
प्रेम पथ से हमें जुदा
तुम्हारे मन के वृन्दावन की
गलियों में
गूंज उठी है मेरी बांसूरी

किशोर

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