गुरुवार, 4 सितंबर 2014

794-"विशाल हृदय"

"विशाल हृदय"

मैं
तुम्हारें मन का
एक खूबसूरत सा ख्याल हूँ
या
बंद या खुली हुई
आँखों का हूँ
मुलायम सा एक सपना

जिसे तुम
मानती हो सिर्फ़ सिर्फ़ अपना

आचार से भरी हुई शीशी की तरह
जिसे संभाल कर रखती हो
असहनीय है जिसका
तुम्हारे लिए दरकना

अपने आँगन के
एक गमले सा
रोज सिंचती हो तुम
मुझ पर
अपने स्नेह का जल
उठा कर रख देती हो
वहाँ पर जहाँ
मुझे अधिक धूप से न पड़े तपना

मेरे शीर्ष पर खिले फूलों से
करती हो पूजा अर्चना

समझ कर मेरी छवि को आईना
हर पल करना चाहती हो
उसकी निगाहों मे
अपने चेहरे और
अपने सौन्द्र्य का मुआयना

मेरे अक्स को खरगोश की तरह
चाहती हो पुचकारना
यूँ भी
अब मैं वह पंछी हूँ
जो तुम्हारे विशाल हृदय के जहाज़ में
सीख गया हैं
उड़ना
ठहरना और कैद रहना

सच सी लगने लगी हैं तुम्हें
मुझसे संबंधित
सारी की सारी कल्पना

किशोर कुमार खोरेंद्र

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