गुरुवार, 4 सितंबर 2014

793-तन्हा और उदास

तन्हा और उदास
सिवा इंतज़ार के
क्या है मेरे पास
घड़ी घुूरती है मुझे
दोनो काँटे मेरी खातिर
चलते ही रहते है
करते नही है विश्राम
वृक्ष ,मुझे सांत्वना देने के लिए
अपनी डालियों को झुका कर
अपनी नरम पत्तियों से मेरा सिर सहलाते है
बादल भी मेरे करीब आकर
मुझसे कुछ कहने का करते है प्रयास
लंबी सुनसान सड़क भी
मेरी तरह लगती है
तन्हा और उदास
फुदकतीी ही रहती है एक नन्ही गौरया
मेरे आसपास
कई दफे मेरा मन कहता है
छोडो यह प्यार व्यार
जिसमे मिलन का अभी तक
नही हुआ है अहसास
पर धड़कने कहती है ..
अरे तुम ही इस दुनियाँ मे अकेले नही हो
यहाँ तो प्रत्‍येक मनुष्य को
है किसी न किसी प्रिय व्यक्ति से
मिलने की आश
और तुम करो न करो
मृत्यु को तुम्हारे लौटने का
पूरा है विश्वास

किशोर कुमार खोरेंद्र

कोई टिप्पणी नहीं: