गुरुवार, 4 सितंबर 2014

792-"वजूद "

"वजूद "

तुम हो महरुख
जबसे निहारा हूँ एक बार
तुम्हारा अनुपम रूप

मन की आँखों से
तुम्हे देखने में
रहता हूँ मस्रुफ

तुम कभी शीतल छाव हो
कभी हो गुनगुनीी धूप

मेरे हर सवाल का
तुम्हारे पास जवाब है
पर तुम अपनी खामोशी के
दायरे में रहती हो मशगूल

तुम्हारी याद आती है
तब लगता है
जैसे बज रहा हो
दूर कहीं मधुर नुपूर

एक जगमगाते तारे सा है
तुम्हारे चेहरे का नूर
मेरे हृदय में
आ बसी है तुम्हारी रूह

लेकिन
तुम रहती हो तन से
ज़मीं से आकाश जितनी दूर
किस्मत मुझसे क्यों गयी है रूठ

तुमसे न मिल पाने के कारण
मेरा जीवन रह गया है
पीकर
अफ़सोस का अम्लीय घूंठ

मेरे प्राण जाने से पहले
अच्च्छा है
यदि तुम्हे आ जाए मेरी सुध

मेरी स्मृति में
तुम्हारी मीठी आवाज़
गूँजती रहती है
फिर भी लोग
कहते है यह स्वप्न है
तुम्हारा नही है कोई वजूद

किशोर कुमार खोरेंद्र

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