गुरुवार, 4 सितंबर 2014

790-"मौन"

"मौन"

वो अक्षर जो जुड़ नही पाए
वो शब्द जो बोले नही गये
मन की गहराई मे दबे रह गये
अनपढ़े रह गये
उनसे भी होगी
कभी न कभी मुलाकात

जब सारी कहानियाँ ,कविताए
मुझे दे न पाएँगे
सच का सच की तरह जवाब
खामोशी लेगी
तब मेरा इम्तहान
कहेगी करो
अब मुझे बेनकाब

अक्षरो से पहले भी हूँ मैं
बन कर भावों का सैलाब
वो भाव जो उमड़ ही नही पाए
कोहरे सा छा कर छट गये
ओस की बूँदो सा लुप्त हो गये
जल में बनी परछाई सा
लहरो के हाथो मिट गये
कहाँ से लौटाकर लाओगे
वे ज़ज्बात

बूँद हो या सागर
बिंब हो या प्रतिबिंब
सबके होते होंगे
अपने अपने अलग से ख्वाब
कोलाहल से घिरकर भी
जैसे
मौन रहता है

 निश्चिंत हो
कण कण मे व्‍याप्त

किशोर कुमार खोरेंद्र

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मौन का सुन्दर विश्लेषण।