बुधवार, 3 सितंबर 2014

789-"तुम्हारे न आने से "

तुम्हारे न आने से

एक पत्ता अपनी डाल पर

नहीं फूट पाया

एक कली खिल नहीं पाई

एक बीज अंकुरित नहीं हो पाया

एक बादल आकर लौट गया

बरस नहीं पाया

एक छाव धूप में बदल गयी

कोहरे की डबडबाई आँखों से

अश्रु की तरह शबनम चू पड़े

तुम्हारे न आने से

खुशी से उच्छलती हुई आई लहरें

उदास होकर लौट गयी

मेरी नसों में बहते हुऐ रक्‍त का

रंग कुछ फीका हो गया

पाषाण की मूरत में

जान आते आते रह गयी

किशोर कुमार खोरेंद्र

2 टिप्‍पणियां:

Aparna Bose ने कहा…

एक बादल आकर लौट गया

बरस नहीं पाया

एक छाव धूप में बदल गयी.... ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya arpana ji