मंगलवार, 15 जुलाई 2014

787--"ज़मीर "

-"ज़मीर "
पानी पर खिंच रहा हूँ लकीर 
मन मेरा न जाने क्यों है अधीर 


रेत  पर लिखा हुआ तुम्हारा नाम 
मिटा गया हैं 
अपनी उँगलियों से समीर 


मुझ लहर को
मिल  गया था किनारा 
ख़्वाब देखने लगा था हसीन 

एक अकेले सफ़ीना  सा 
फिर मँझधार  में पहुँच गया हूँ 
तन्हाई का महासागर हैं असीम 
फिर से सफर 
हो गया है कठिन 

कोई पत्थर के एक टुकड़े  की तरह
उठाकर 
मुझे भी उछाल दे 
जल की सतह पर फिसलते फिसलते 
मैं भी पहुँच जाऊंगा तुम्हारे करीब 
तुम्हारी तरह 
तुम्हारे शहर में भी है कशिश 

बिना तुम्हारे
मेरे पैरों तले 
खिसक गयी है जमीन 
मैं शरीर हूँ 
तुम  हो मेरा जमीर 

किशोर कुमार "खोरेन्द्र "

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