सोमवार, 14 जुलाई 2014

785-"सृजन"

"सृजन"

तुम पूछती हो मुझसे 

इतना किस तरह से 

कर लेते हो 

काव्य का लेखन 

जैसे किसी वन के

वृक्षों की टहनियों पर

खिलते है प्रतिक्षण

अनगिनत सुमन

वैसा ही है मेरा मन

भी एक कानन

ग़रज़ ग़रज़ कर

जब

बरसता है सावन

होता हैं

तब

ह्रदय में

सरस भावों का प्रस्फुटन

जब देखता हूँ

झील के दर्पण में

चाँद का खूबसूरत आनन

जब

सुनाई देता हैं

अमराई से

कोयल का मधुर गायन

जब तितलियों की तरह

मेरे नयन

कर लिया करते हैं

रंगों का संचयन

ध्यान से सुना करता हूँ

भ्रमों का गुंजन

जब जब होता है

बसंत का आगमन

जब मकड़ी अपने ही

बने जाल में फंसकर

त्याग देती है

अपना जीवन

जब जल के आभाव में

मछली को

प्राप्त होता हैं मरण

भूख से तडफता व्यक्ति

कैसे करे ज्ञान का अर्जन

जब जगमगाते अनंत सितारों के

कोलाहल के बीच

अंतरिक्ष को

महसूस होता है

नितांत एकाकीपन

जब पतझड़ लिख जाता है

शुष्क पत्तों की

लकीरो पर दर्द भरा

असहनीय सूनापन

तब मेरे मन में

अपने आप होने लगता है

काव्य का सृजन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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