सोमवार, 14 जुलाई 2014

784-"खूबसूरत "

"खूबसूरत "
मेरी नज़र में 
तुम हो 
बला की खूबसूरत 
मेरी आँखों में 
बसी है 
इसीलिए तो 
तुम्हारी सुन्दर मूरत 

सुन लिया करो
मेरे चिर मौन का
मधुर प्रणय निवेदन
मैं सिर्फ नहीं हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का उपासक
मेरी कविताएं
मेरे ह्रदय के उदगारों के
होते है हूबहू उदबोधन

मेरे मन के सागर की तरह
तुम्हारे मन के सागर में भी
चलता रहता है सतत
प्रेम अभिव्यक्ति हेतु
ऊहापोह की रस्सियों से
घिरा हुआ एक अमृत मंथन

मेरे भीतर जो कर गयी हो
अनुराग के बीज का रोपण
उसका हो चुका है
अब मेरे ह्रदय में
सघन अंकुरण

इसी तरह से
तुम्हारी चेतना में
वटवृक्ष की तरह
फैला हुआ हूँ
तुम्हारी नींद हो
या तुम्हारे सपन
या हो तुम्हारा जागरण
उभर आयो
असंख्य जड़ो का है
वहां पर सुदृढ़ बंधन

ठीक वैसे ही मुझे
घेरे रहती है
तुम्हारी रूह की महक
तुम्हारी परछाई मेरा
पीछा करती सी लगती है
बदलो सा आकृति
धर लेती है वह व्यापक

तुम्हारी आँखों की ज्योति
सुबह की किरणों की तरह
मुझ पर
बरस पड़ती है अचानक

तुम्हारी यादो की बौछार से
भींगा भींगा
लगता है सावन
तुम्हारे गेसूओं की तरह
पसर आयी संध्या
के आगोश में
फिर
मुझे तनहा छोड़ जाता हैं
अस्ताचल का
डूबता हुआ सूरज
मेरी नज़र में
तुम हो
बला की खूबसूरत

kishor kumar khorendra 

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