सोमवार, 14 जुलाई 2014

783-कोरा दर्पण"

कोरा दर्पण"

मैं कोरा दर्पण हूँ 
मेरे वक्षस्थल में 
समायी हुई 
तुम हो एक 
सुन्दर सी परछाई 

मैं स्वच्छ होकर 
और चमक ऊठा हूँ 
जब भी तुम हो मुस्कुराई

मेरा संयमित मन
दरक गया हैं
जब भी तुमने
मेरे सम्मुख ली है अंगड़ाई

कांच के भीतर
मेरी अपनी एक
पारदर्शी दुनियाँ हैं
जिसमे रंग भर जाती है
तुम्हारी कमल सी
खिलती हुई तरुणाई

यह जानकार की
मैं बेजान सा हूँ
मैं तुम्हे छू नहीं सकता हूँ
मैं तुमसे कुछ बोल नहीं सकता हूँ
न अभिव्यक्त होने वाला मेरा यह प्रेम
पत्थर की तरह ठोस होते हुए भी
इकतरफा और एकाकी है

यह सोचकर
रो पड़ती है कभी कभी
मेरी चिर परिचित तन्हाई

kishor  kumar khorendra 

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