सोमवार, 14 जुलाई 2014

780-मधु यामिनी "

मधु यामिनी "

छिटकी हैं चांदनी 
अम्बर में 
सितारों के नूर से भरी 
बह रही हैं 
एक और मंदाकनी 

बादलों की ओट से 
पूनम का चाँद भी 
हमें झाँक रहा हैं
तुम्हारे और मेरे
मिलन की है
यह मधु यामिनी

शरमा कर तुम्हारे रुखसार
हो गए हैं शर्बती
नजदीक आने से डर रही हो
तृषित अधरों पर हैं कपकपी
छेड़ रही हैं दूर कहीं
सागर की लहरे मधुर रागिनी

आओ बंधन सारे खोल दूँ
सुर्ख परहन तुम्हारे हैं रेशमी
तुम्हारी काया खुद कंचन हैं
मुझे पसंद हैं yah सादगी

छिटकी हैं चांदनी
अम्बर में
सितारों के नूर से भरी
बह रही हैं
एक और मंदाकनी

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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