सोमवार, 5 मई 2014

778-प्यार का दूसरा खत "

प्यार का दूसरा खत "

अब और न लेना तुम
मेरी गहन परीक्षा
मुझे हैं सिर्फ़
तुम्हारी ओर से
हाँ की प्रतीक्षा
कई जन्मों से
रहा हूँ मैं तुम्हारा प्रेमी
प्यार मांगने से नहीं मिलता
इसलिए न किया करो
तुम मेरे प्रयासों की समीक्षा
वियोग में तुम्हारे
सितारों सा
गर्दिश में भटकता रहा हूँ
व्यतीत हो गयी है शायद
अनेकों सदियाँ
पर तुम्ही रही हो
मेरी एक मात्र प्रेमिका

मैं जिस्म नहीं हूँ
रूह हूँ
अब तो दे दो मुझे
तुम प्रेम की दीक्षा

किशोर