सोमवार, 5 मई 2014

778-प्यार का दूसरा खत "

प्यार का दूसरा खत "

अब और न लेना तुम
मेरी गहन परीक्षा
मुझे हैं सिर्फ़
तुम्हारी ओर से
हाँ की प्रतीक्षा
कई जन्मों से
रहा हूँ मैं तुम्हारा प्रेमी
प्यार मांगने से नहीं मिलता
इसलिए न किया करो
तुम मेरे प्रयासों की समीक्षा
वियोग में तुम्हारे
सितारों सा
गर्दिश में भटकता रहा हूँ
व्यतीत हो गयी है शायद
अनेकों सदियाँ
पर तुम्ही रही हो
मेरी एक मात्र प्रेमिका

मैं जिस्म नहीं हूँ
रूह हूँ
अब तो दे दो मुझे
तुम प्रेम की दीक्षा

किशोर

777-नीम की तरह "

नीम की तरह "

लज्जा है तुम्हारा घूँघट
संकोच है तुम्हारा गहना
मौन रह कर
आता है तुम्हें
प्यार भरी बातो को कहना

मै तो मुग्ध हूँ तुम पर
खींचा चला जाता हूँ
जिधर इशारा करते हैं
तुम्हारे दो खूबसूरत नयना

ठिठक गया हूँ ,खो गया हूँ
निहारकर तुम्हारा दिव्य रुप
भूल गयी है
मेरे मन की नदी अपना बहना

तुम्हे निहारते ही
इस प्रस्तर से कठोर शहर में
याद आता हैं मुझे
गांव का वह
मीठे जल से भरा मृदु झरना

वियोग क सच यदि
नीम की तरह कडुवा हैं लगता
तो क्या हुआ
तुमसे तो रोज ही मिलता हूँ
जब नींद में
देखा करता हूँ
मैं मधुर सपना

किशोर

776-पहला खत "

पहला खत "

प्यार का हैं
यह पहला खत
तुम मुझे लिखने से
मना करना मत

अनुराग का
यह सिलसिला
जारी रहे अनवरत
सिर्फ तुम्हारे रुप का
मैं नहीं हूँ पुजारी
मेरी इस बात से
तुम भी हो सहमत

मूँदता हूँ जब नयन
भोर की नूर सी
तुम्हीं आती हो नज़र
सांसों में बसी हुई हैं
तुम्हारी रूह की महक

स्निग्ध चांदनी सी
बरस पड़ी हो मुझपर
प्रणय हुआ हैं हमे
एक दूजे से शाश्वत
प्यार का हैं
यह पहला खत
तुम मुझे लिखने से
मना करना मत

किशोर

"775-हमराह "

"हमराह "

तुम्हारे दामन ने
मेरी आवारगी को दिया हैँ पनाह
मुझे तुम्हारी ही तलाश थी
ओ मेरे हमराह

अब नहीं रहा मै तन्हा
जबसे तुम करने लगी हो
कदम कदम पर मेरी परवाह

तुम गंगा सी
पावन एक नदी हो
तुमसे आ मिला हूँ अब मै
तुमसे जन्मों से
बिछड़ा हुआ था मै
एक प्रवाह

तुम्ही मंजिल हो मेरी
तुम्ही हो अब मेरी राह
मेरे जीवन में
अब शेष नहीं रही
तुमसे मिलकर कोई चाह

तुम्हारे दामन ने
मेरी आवारगी को दिया हैँ पनाह
मुझे तुम्हारी ही तलाश थी
ओ मेरे हमराह

किशोर