शनिवार, 19 अप्रैल 2014

773-"न तुम देह हो न मन"

"न तुम देह हो न मन"

न तुम देह हो न मन
न इस जन्म में
मेरा तुमसे कोई हैं सम्बन्ध

फिर भी
कोलाहल से दूर ..
अपने निज के एकांत में ..
तुम्हें अब पाने लगा हूँ अपने पास ..

नदी के पांवो में
चांदी के लहरों की पायल की
हो आवाज मधुर
या
कल्पना के आकाश से
अनंत सितारों की आँखों के सदृश्य
क्यों निहारती हो मुझे एकटक ..घूर
और सिहर उठता हैं
तब मेरा ऊर

और मैं महसूस करता हूँ
तुम्हारा वजूद ......
हालाकि -
तुम हो अदृश्य या मुझसे बहुत बहुत दूर .....
तुम हो मेरा एक ख्याल
जिसमे हो तल्लीन
मै रहता सदैव मन्त्र मुग्ध

किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: