सोमवार, 21 अप्रैल 2014

774-"मुलाकात"

"मुलाकात"

जबसे हुई हैं
तुमसे मुलाक़ात
अंगड़ाई लेने लगी हैं
मेरी हर रात
मुझसे शरारत
करने लगी हैं मेरी हयात
भांग सी घुलमिल गयी हैं
तुम्हारी शोखियाँ
मेरी धड़कनो के साथ

सुरूर सा छाया रहता हैं
मानो एक मधुशाला हो
मेरे भीतर आज
तुम्हारी यादें
मेरी हमसफ़र बन गयी हैं
जबसे बनी हो
तुम मेरी हमराज

मैं तुम्हारे साये के संग
रहता हूँ
उसी से करता रहता हूँ
मैं संवाद
तुम्हारी छवि मेरी निगाहों में
उभर आई हैं
होकर एकदम साफ़ और निष्पाप

मेरी नसों में
अमृत का दरिया बहने लगा हैं
नहीं रहा सराब
सियाह अमावश में
मानो जल उठे हो
हज़ारो सिराज

ख्यालों में तुम हो
ख़्वाबों में तुम हो
नहीं रहा अब शबे -हिज़्र का
चिर अहसास

ओ मेरे हमदम ,मेरे हमराह
तुम्हारे होने से
मेरे आसपास
खिल उठे हैं सदाबहार अमलताश

तुम्हारे सौंदर्य के सरोवर में
डुबकी लगाकर धूप
बाहर निकल कर
आती हुई सी लगती है
जब होता है प्रभात
जबसे हुई है तुमसे
मेरी मुलाक़ात


किशोर कुमार खोरेन्द्र

{हयात =जिंदगी सिराज =दीपक ,शबे हिज्र =विरह की रात ,सराब =मृगतृष्णा}

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

773-"न तुम देह हो न मन"

"न तुम देह हो न मन"

न तुम देह हो न मन
न इस जन्म में
मेरा तुमसे कोई हैं सम्बन्ध

फिर भी
कोलाहल से दूर ..
अपने निज के एकांत में ..
तुम्हें अब पाने लगा हूँ अपने पास ..

नदी के पांवो में
चांदी के लहरों की पायल की
हो आवाज मधुर
या
कल्पना के आकाश से
अनंत सितारों की आँखों के सदृश्य
क्यों निहारती हो मुझे एकटक ..घूर
और सिहर उठता हैं
तब मेरा ऊर

और मैं महसूस करता हूँ
तुम्हारा वजूद ......
हालाकि -
तुम हो अदृश्य या मुझसे बहुत बहुत दूर .....
तुम हो मेरा एक ख्याल
जिसमे हो तल्लीन
मै रहता सदैव मन्त्र मुग्ध

किशोर

772-"देह आभास "

"देह आभास "

बिना देह आभास के
कैसे करूँ मैं तुम्हारी आराधना
निराकार की कठिन होती है साधना
साकार मिलने का इसलिए
प्रिये करो तुम वादा

तुम हो अमृतमयी धारा
तुम बिन महासागर होकर भी
हूँ मैं खारा

हज़ारों गोपियों में
हो तुम
भावनायुक्त एक बाला
तुम्हें ही पहनाना चाहता हूँ मैं
इसलिए प्रेम सुमनों से गूँथी हुई माला

तुम ही हो मेरी राधा
इसलिए कृष्ण सा क्यों न रिझू
मैं
तुम पर ही सबसे ज्यादा

सब कुछ इशारे से ही कह देती हो
तुम्हारे मौन से मुझे हुआ हैं फायदा
कहते हैं गुपचुप रहने का ही
प्रेम में हैं कायदा

वियोग में होता हैं
आवारगी का अहसास
मिलन में मन रहता हैं
प्रणय में तल्लीन
राग में मिला होता ही है
कुछ मीठा और कुछ नमकीन
तन नही है
दो रूहों के संयोग में बाधा
शरीर के पास हैं
रूह तक पहुँचाने का दरवाज़ा

इसलिए
प्यार के पथ में बिछा होता हैं
कहीं पर फूल तो कहीं पर काँटा
नहीं होता है वह
एकदम सीधा और सादा

सदियों का हो या
जन्मों का अंतर
मिल ही जाते हैं प्रेमी
हो यदि उनमे
अनुराग प्रगाढ़ और गाढ़ा
तुम ही हो मेरी राधा
इसलिए कृष्ण सा क्यों न रिझू
मैं
तुम पर ही सबसे ज्यादा

किशोर कुमार खोरेन्द्र