शुक्रवार, 7 मार्च 2014

770-"कविता की दुनियाँ में"

"कविता की दुनियाँ में"

तुम्हारे अक्षर ..

मेहंदी से ,रचे होते हैं

तुम्हारे शब्दों में ,

मोंगरे की महक होती हैं

तुम्हारी कविता में,

इंतज़ार की असहनीय पीड़ा होती हैं

ज्ञात नहीं वह कौन हैं

जो बिना मिले ही चला गया हैं

फिर भी तुम्हें ....

उसकी याद आती हैं

तुम्हारे पास उसकी तस्वीर भी नहीं हैं

फिर भी तुम उसे खोजती हो

वह शायद ....

किसी गाँव की अमराई के पास

या

किसी महानगर के समुद्र के करीब

या

किसी वन की गुफा के भीतर

रहता हैं

हो सकता हैं वह आकाश में चमकते

अनंत सितारों में से कोई एक हो

मैं भी उसे ही ढूंढ़ रहा हूँ........

लेकिन तुम्हारे और मेरे नजरिये में

एक अंतर हैं

तुम उस अजनबी कों पुरुष समझती हो

और

मै उस अनामिका कों स्त्री समझता हूँ

कई बार मुझे भ्रम होता हैं

कि....

कविता कि दुनियाँ में कही

हम दोनों ...एक दूसरे कों

तो नहीं तलाश रहें हैं

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

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