शुक्रवार, 7 मार्च 2014

768-"दो टूक "

"दो टूक "
 
१-
आ गया फागुन
भाये गुन अवगुन

२-

बहुत घना हैं कोहरा
फिर भी
साफ़ साफ़
दिखाई दे रहा हैं
मुझे तुम्हारा चेहरा

३-
कभी झगड़ा कभी नाराजगी
प्यार की
यही हैं सादगी

४-
बिछड़ा हूँ तुमसे जबसे
फिर कभी नहीं हुआ मिलन
विरह ही तो हैं
मेरा यह एकाकी जीवन

५-
उन्हें हम करते हैं
हर सांस में महसूस
लेकिन
उन्हें यह बात आज तक
नहीं हैं मालूम

६-

उनकी निगाहें मेरी अनुपस्थिति को
घूरती सी लगती हैं
उनके कान मेरी खामोशी को
सुनते से लगते हैं
उनकी परछाई मेरे आसपास जो रहती हैं

७-
मेरे पास हैं प्रणय
आपके पास नहीं हैं समय
यह सोचकर
मुझे होता हैं विस्मय

८-
हुश्न को आता हैं इतराना
इश्क़ को तो उसकी हर अदा पर
सिखते जाना हैं
रोज रोज मर जाना

९-
करों न कोई गिला न शिकवा
फिर से बन जाओ मितवा

१०-
ठीक हैं
मैं ही हूँ दोषी
लेकिन
सजा सी लगती हैं
आपकी खामोशी

११-
हो जाता हैं छोटी सी बात से भी भरम
छोडो ना भी यह वहम

१२-

फिर से करे नयी शुरुवात
अजनबी थे
और अजनबी है
फिर से आज

१३-

तोड़ों ना नेह का नाता
बड़ी मुश्किल से जो
जुड़ हैं पाता

१४-

आभासी दुनिया के हैं हम दोस्त
करते रहते हैं
जो मन में आता हैं वह पोस्ट
१५-

पुरुष हो या महिला
लेखन से ज्ञान
एक समान मिला

१६-जानबूझकर तुम करती हो देरी
ताकि
बातें रह जाए अधूूरी

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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