बुधवार, 12 मार्च 2014

771-"जीवन का अरथ"

"जीवन का अरथ"

मन की न जाने

वह कौन सी हैं परत

जहाँ पर छिपकर

बैठा हैं

जीवन का अरथ

जब से इस

धरती पर

लिया हूँ जनम

कभी मेरी

कभी उसकी

बात होती नहीं ख़तम

संवाद चलता हैं निरन्तर

हर प्रशन

लगता हैं मुझे निरुत्तर

वृक्ष ,हो या नदी

सागर हो या परवत

सब खमोश रहते हैं

मै ही उलझता रहता हूँ

कभी रोटी के लिये

कभी पानी के लिये

कभी प्रेम के लिये

भीतर भीतर

सामाजिक व्यवस्था दोषी हैं

या आर्थिक विषमता

या मेरी निज की अनंत कामना

नहीं जानता क्या हैं

मेरी बेचैनी का कारण

कभी लगता हैं इतने सारे तारो और ग्रहों के बीच

ब्रम्हांड में क्यों फिर रहा हूँ मै

निरुद्देश्य और तन्हा

कोई तो होगा व्यक्ति ऐसा

जिसके प्रति मुझमे आकर्षण

और प्रेम होगा गहरा

लेकिन उसे कैसे मै पहचान पाउँगा

जीवन पर मृत्यु का हैं पहरा

किशोर

सोमवार, 10 मार्च 2014

771-"नयी कहानी "

"नयी कहानी "

तुम्हारे द्वारा लिखी जा रही
नयी कहानी का
मैं हूँ नायक
तुम्हारा आभारी हूँ कि
मुझे चुना और
माना इस लायक
ऐसे तो मैं साधारण इंसान हूँ
पर कवि होने के नाते
शब्दों का हूँ मैं उपासक
चाहता हूँ कि
लिखने से पहले तुम मुझे
लो अच्छी तरह से परख
दूर से लगती होगी मेरी शरारत
तुम्हें मनमोहक
पर मुझे ज्ञात नहीं
मुझमे किस हद तक हैं शराफ़त
हाँ मुझमे नहीं हैं दहशत
जो भी कहना चाहता हूँ
लिख दिया करता हूँ बेझिझक

काव्य के जरिये
किसी प्राचीन कंदरा सा
खुद ही खुल रहा हूँ
परत दर परत
प्रकृति ,ईश्वर और कल्पना
के सौंदर्य का
वर्णन करना है मेरा मकसद
इस कायनात के महाशून्य
के निरुत्तर मौन सा
मेरे भीतर भी हैं
एक चिर जिज्ञासा
जो
रहस्यमयी है
और हैं जो
अंतरिक्ष के सदृश्य व्यापक

उसी सौंदर्य से
उसी रहस्य से है मुझे मुहब्बत
तुम्हारी निगाहों में
मैंने उसी तन्हाई के सागर को देखा है
इसीलिए तुम भी
मुझे लगती हो चित्ताकर्षक
मुझ पर कथा लिखने से पहले
तुमसे मेरी यही है गुज़ारिश कि
तुम ही नायिका के रूप में
करना अपना चरित्र चित्रण
ताकि वास्तविक जीवन में
जो प्रेम न हो पाया
वह दो पात्रों के माद्यम से
हो सके प्रकट

पूरी कहानी पढकर
कभी रोमांचित
कभी अश्रुपूरित
हो जाए पाठक
तुम्हारे द्वारा लिखी जा रही
नयी कहानी का
मैं हूँ नायक
तुम्हारा आभारी हूँ कि
मुझे चुना और
माना इस लायक

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

770-"कविता की दुनियाँ में"

"कविता की दुनियाँ में"

तुम्हारे अक्षर ..

मेहंदी से ,रचे होते हैं

तुम्हारे शब्दों में ,

मोंगरे की महक होती हैं

तुम्हारी कविता में,

इंतज़ार की असहनीय पीड़ा होती हैं

ज्ञात नहीं वह कौन हैं

जो बिना मिले ही चला गया हैं

फिर भी तुम्हें ....

उसकी याद आती हैं

तुम्हारे पास उसकी तस्वीर भी नहीं हैं

फिर भी तुम उसे खोजती हो

वह शायद ....

किसी गाँव की अमराई के पास

या

किसी महानगर के समुद्र के करीब

या

किसी वन की गुफा के भीतर

रहता हैं

हो सकता हैं वह आकाश में चमकते

अनंत सितारों में से कोई एक हो

मैं भी उसे ही ढूंढ़ रहा हूँ........

लेकिन तुम्हारे और मेरे नजरिये में

एक अंतर हैं

तुम उस अजनबी कों पुरुष समझती हो

और

मै उस अनामिका कों स्त्री समझता हूँ

कई बार मुझे भ्रम होता हैं

कि....

कविता कि दुनियाँ में कही

हम दोनों ...एक दूसरे कों

तो नहीं तलाश रहें हैं

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

769-"उनकी छवियों कों"

"उनकी छवियों कों"


पंखे कों लगाव है छत से

घड़ी कों दीवार से

कालीन कों फर्श से

हरी दूब कों प्यार है आँगन से

कोट भी मुझे

है .. अपना समझ कर

पहनता

लेकीन

मुझे इसका अहसास

नही हो पाता

मन के वशीभूत

मै ...

रह जाता हूँ

दिवस सा भटकता

भूल जाया करता हूँ

की धरती भी करती है

सूरज की परिक्रमा

चाँद भी निहारता है

पृथ्वी की हर अदा

सितारों कों भी मै

एक कण के तारे सा ...

दिखायी देता होउंगा सदा

मेरा जूता ,मेरी चप्पल ,मेरी कमीज

मेरा कालर ,मेरी तमीज

मेरी मै ,मै ..से

ऊब चुके है -

मुझे ऐसा है लगता

इस दुनियाँ की सबसे बड़ी खिड़की

जहां से क्षितिज है मुझे झांकता

इस दुनियाँ का सबसे बड़ा दरवाजा

जहाँ से

समूचा आकाश है मुझे ओढ़ता

वही से सूरज धूप बन मुझे

पढ़ता है

वही से बादल

कोहरा बन मुझे

है आ घेरता

किसी की खूबसूरत निगाहें
मेरी अनुपस्थिति को एकटक देखती हैं

किसी के कान के झुमके
मेरी ख़ामोशी को
गौर से सुनते हैं

इस सच कों मान कर
मै भी चाहता हूँ जीना
उनकी छवियों कों
मन के दर्पण मे
अब समाकर
सबके साथ रहना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

768-"दो टूक "

"दो टूक "
 
१-
आ गया फागुन
भाये गुन अवगुन

२-

बहुत घना हैं कोहरा
फिर भी
साफ़ साफ़
दिखाई दे रहा हैं
मुझे तुम्हारा चेहरा

३-
कभी झगड़ा कभी नाराजगी
प्यार की
यही हैं सादगी

४-
बिछड़ा हूँ तुमसे जबसे
फिर कभी नहीं हुआ मिलन
विरह ही तो हैं
मेरा यह एकाकी जीवन

५-
उन्हें हम करते हैं
हर सांस में महसूस
लेकिन
उन्हें यह बात आज तक
नहीं हैं मालूम

६-

उनकी निगाहें मेरी अनुपस्थिति को
घूरती सी लगती हैं
उनके कान मेरी खामोशी को
सुनते से लगते हैं
उनकी परछाई मेरे आसपास जो रहती हैं

७-
मेरे पास हैं प्रणय
आपके पास नहीं हैं समय
यह सोचकर
मुझे होता हैं विस्मय

८-
हुश्न को आता हैं इतराना
इश्क़ को तो उसकी हर अदा पर
सिखते जाना हैं
रोज रोज मर जाना

९-
करों न कोई गिला न शिकवा
फिर से बन जाओ मितवा

१०-
ठीक हैं
मैं ही हूँ दोषी
लेकिन
सजा सी लगती हैं
आपकी खामोशी

११-
हो जाता हैं छोटी सी बात से भी भरम
छोडो ना भी यह वहम

१२-

फिर से करे नयी शुरुवात
अजनबी थे
और अजनबी है
फिर से आज

१३-

तोड़ों ना नेह का नाता
बड़ी मुश्किल से जो
जुड़ हैं पाता

१४-

आभासी दुनिया के हैं हम दोस्त
करते रहते हैं
जो मन में आता हैं वह पोस्ट
१५-

पुरुष हो या महिला
लेखन से ज्ञान
एक समान मिला

१६-जानबूझकर तुम करती हो देरी
ताकि
बातें रह जाए अधूूरी

किशोर कुमार खोरेन्द्र