शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

757-"दो टूक "

"दो टूक "

१-
इश्क़ में होता आया हैं
यही अक्सर
मैंने कभी कुछ कहा नहीं
और तुमने कभी कुछ पूछा नहीं

२-
तुम्हें हर पल मैं करता हूँ याद
इसके अलावा भी कोई तरिका हो
प्यार करने का तो बतलाने के लिए
कर रहा हूँ फ़रियाद

३-
सिवा तुम्हारे किसी से नहीं हैं मेरा नाता
तुम्हें यह पर मैं कैसे समझा पाता

४-
दूर दूर तक हैं कोहरा
सम्भव कहाँ
देख पाना अपना ही चेहरा


पैसे से किसी को
नहीं सकता हैं कोई खरीद
समर्पित होकर ही
बन सकते हैं
हम किसी के मुरीद

६-
जो खो दिया
उसके लिए होता हैं अधिक दुःख
जो मिला हैं
कम हो जाता हैं
इसलिए उसका सुख

७-
यदि किसी से मोहब्बत करते हो
तो रहना चुप
चाहे जीवन बीत जाए
जीते हुए
उसकी इच्छाओं के अनुरूप

८-
स्नेह के तार
कभी न कभी
कहीं न कहीं जाते हैं जुड़
राह पर चलते चलते
किसी न किसी की ओर
हम आखिर में जाते ही हैं मुड़

९-
कोशिश बहुत करता हूँ
की तुम्हे मैं जाऊँ भूल
विरह के पर
चुभते हैं शूल

१०-
सम्मान ,आदर
भी स्नेह का एक रूप हैं
तुम्हारे ही लिए
मेरा शेष जीवन
अब पूरी तरह से
प्रस्तुत हैं

११-
मिल ही जाते हैं कुछ लोग
जो अपने से लगते हैं
ख्यालों में
सपनों में
वे ही अब नज़र आते हैं

१२-
तुम्हारी तस्वीर से
हो गयी हैं मुझे मोहब्बत
तुम्हारी परछाई के
संग ही हैं मेरी सुहबत
तुम्हारे ख्यालों से आबाद हैं
मेरी मोहलत

१३-
आकाश पर छाये रहे बादल
मानो सूरज ने
अपनी आँखों पर
लगा लिया हो काजल

१४-
अपने ह्रदय में दो मुझे स्थान
यही तो हैं वास्तविक जान पहचान

१५-
तुमसे चाहे न हो
कभी मुलाक़ात
या
तुमसे संकोचवश न कह पाऊँ
अपने दिल की बात
पर दूर से ही सही
मुझ पर पड़ते हैं
जो तुम्हारी नज़रों के तीर
वे हैं मेरे लिए अमूल्य सौगात

१६-
तुम्हारी रूह और मेरी रूह
के बीच हैं
कुछ क़िताबें
कुछ पन्नें
कुछ कवितायें हैं
जिन्हें पढ़कर मैं समझ जाया करता हूँ
तुम्हारी किताबें ,तुम्हारे शब्द ,और
तुम्हारी कवितायें मुझे
नहीं लगते अब दुरूह

१७-प्रेम का होता नहीं हैं सबूत
कविता लिखो या न लिखो
प्यार होता हैं अटूट

१८-
तुम पर हूँ मैं
हालांकि फ़िदा
लेकिन रहना तो हैं हमें
आजीवन जुदा जुदा

१९-
कविता के प्रति
काव्य का हैं यह असीम अनुराग
बूझ सको तो बूझ लो
यह नूतन राग
तुम्हारी और मेरी रूह के हैं
यहाँ पर सिर्फ ज़ज़बात

२०-
तुम्हारी कविता कर लेती हैं मुझे आबद्ध
पढते पढते खो जाता हूँ
होकर नि:शब्द

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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