सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

766-"मधुमास "

"मधुमास "



वन में
खिल गए पलाश
आ गया मधुमास

सरस हुए बादल
प्यार की बूंदों की
हुई बरसात

उड़ा कर गोरी का आँचल
रसिक हुई बयार

छेड़ गयी अमराई में
कोयलिया मधुर तान

गुनगुनाने लगे भंवरें
उपवन में
कलियों ने किया श्रृंगार

बज उठे नगाड़े
टहनियों पर
झूम उठे पात पात

सुबह लाल सांझ को
सिंदूरी हुआ आकाश

मन की धीरे धीरे
खुलने लगी हैं गाँठ

आने लगे हैं अधरों पर
भूले बिसरे फाग

काट दिया हैं मुझे भी
किसी के प्रखर चितवन ने
पतंग सा उड़ चला हूँ
मैं भी उसके पास

गोपियों संग फिर
रचाएंगे कान्हा रास

वन में
खिल गए पलाश
आ गया मधुमास

किशोर कुमार खोरेन्द्र