शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

765-"दो टूक"

"दो टूक"

 

१-
जबसे तुम हुए हो
मुझसे जुदा
तलाश रहा हूँ मैं
तबसे खुदा

२-
कभी मत भेजना मुझे ख़त
न कोई सन्देश
न करना मुझ पर संदेह
मैं खुद आकर मिल लिया करूंगा
हमेशा के लिए अलग होते समय
यह सांत्वना अच्छी हैं

३-
कितनी भी तुम रहो दूर
मुझ तक पहुँच ही जाता हैं
तुम्हारी आँखों का नूर
तुम्हारे ओंठों का रंग
सुबह की लालिमा बन
लिया करता हैं मुझे चूम
खामोशी की रेत पर
बने तुम्हारे पदचिन्हों पर
ठहरी हुई घुंघरूओं की आवाज
लिया करता हूँ मैं सुन

४-
तिल का
कुछ लोग बनाकर ताड़
जहर बुझे तीरों से
करते हैं प्रहार
लेकर उस काल्पनिक वृक्ष की आड़

५-
एक दिवस में
अपने ह्रदय का सारा प्यार
मुझ पर तुम दो वार
इसी दिन का था
मुझे इंतज़ार

६-
तुम्हारी यादों का हैं
कोहरा घना
चाहता हूँ मैं उससे
हमेशा घिरा रहना

७-
तुम्हें वैसे ही मैंने
अपने ह्रदय में हैं रखा
जैसे अर्जुन के
कृष्ण थे एकमात्र सखा


जिसे समझना हैं
वह समझ जाता हैं
यह और बात हैं
लिखना मुझे
कहाँ आता हैं

९-
कभी तुम्हारे रूप से
होता हूँ आकर्षित
कभी तुम्हारे मन से
होता हूँ मोहित
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
मिलन क़ब होगा आखिर
वियोग जिसकी तपस्या हैं
ऐसा हूँ
मैं एक आशिक़

१०-
तुम अनुभवी लहर हो
और मैं हूँ
तटस्थ एक साहिल
तुम्हारी सराहना के बल पर
बन पाया हूँ मैं
तुम्हारे कुछ तो काबिल

११-
चाहो तो तुम ले लो
मेरी परीक्षा
जितना तुम मुझे जानते हो
उससे भी ज्यादा
मैं हूँ
एक व्यक्ति अच्छा

१२-
न जाने कब थम जायेगी सांस
बची रहेगी
पर और और जीने की आश

१३-
तुमने कह दिया कि
मोहब्बत का
मत करना इज़हार
तबसे
मौन की ईटों से
मैंने आपने चारों ओऱ
उठा ली हैं दीवार

किशोर कुमार खोरेन्द्र