शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

764-"सामना"

"सामना"
 
तुम्हारा स्नेह मुझ पर
बना रहे सदा
यदि राह से
भटक जाऊं यदाकदा
सम्भाल लेना मुझे
एक इंसान हूँ
इसीलिए तो
तुम पर हुआ हूँ फ़िदा

सीधे तुम्हारी रूह तक
पहुँचने के लिए
तुम्हारे तन के अनुपम सौंदर्य
तुम्हारे मन के तीव्र सम्मोहन
से अछूते रहने का
तुम दो मुझे हौसला

हर बार खुद को दोराहे पर
पाता हूँ मैं खड़ा
कभी पूरी होती सी लगती नहीं
क्यों कामना
तुम मेरे लिए सच हो
तुम्हारा ही करना चाहता हूँ
मैं इसीलिए सामना

किशोर कुमार खोरेन्द्र