शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

763-"मौन "

"मौन "
 

पृथ्वी गेंद हैं
घूमती हैं
पृथ्वी पतंग हैं ,उड़ती हैं
पृथ्वी गिरे तो कहाँ गिरे
उठे तो कहाँ उठे

ग्रह उपग्रह सितारें
और अंतरिक्ष के सभी नज़ारें
एक दूसरे के हैं सापेक्ष
मनुष्य ही करता हैं कोशिश
जीने के लिए निरपेक्ष

बाहर के शून्य के ही जितना
मन के भीतर भी है शून्य
उसे ही महसूस करने के लिए
मिला हैं हमें
यह जीवन अमूल्य

उस खाली से ,सूने से ,मूक से
मौन के सागर में
भरा हैं प्यार का जल
इसीलिए तो
आँखों से हमारे
उमड़ आते हैं
करुणा से ओतप्रोत
अश्रु बूँदें निर्मल

ठीक मृत्यु के पूर्व तक
माँ बेटे बेटी को एक नज़र देखने के लिए
तड़फती हैं
पिता के प्राण भी इसी तरह अटके रहते हैं
नहीं हो पाता हैं मनुष्य , रिश्तों से परे
रूह की आँखों मैं भी
रहते हैं शायद इसीलिए
अपनों के ही चित्र भरे

ज्ञान से और कर्म से
दोनों से बड़ा हैं प्रेम
धागा स्नेह का अटूट रहे
चाहते ,हवा हो या पानी
धरती हो ,अग्नि हो या व्योम

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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