सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

762-तुम ही हो प्रिये ......!

तुम ही हो प्रिये ......!


कभी तुम

मुझे सच लगती हो

कभी झूठ



में तुम्हे मनाऊं कैसे ..

तुम तो अक्सर

जाती हो मुझसे रूठ





जान नहीं पाया

अब तक कि ....

तुम्हारा मेरे प्रति

सकारात्मक या

नकारात्मक है रुख



फिर भी मै तुम्हे चाहता हूँ

तुम्हारे सिवा भाया नहीं

मुझे किसी का रूप



मुझे स्वीकार करो या नकार दो

तुम पूनम की चांदनी हो

और मै हूँ अमावश का

अन्धकार .....घुप



मुझे तो रहना ही होगा

इसलिए

बीहड़ के एकांत सा बस चुप



मेरे प्राण की नीरसता को जो सरस कर दे

तुम ही हो मेरे लिए प्रिये ...

वह अमृत बूंद

मेरे ह्रदय के अन्धकार को जो हर ले

तुम ही हो मेरे लिए प्रिये ....

वह धूप



किशोर

4 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

भावो का सुन्दर समायोजन......

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya sushma aahuti ..ji

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

ranjana verma ji shukriya