रविवार, 9 फ़रवरी 2014

761-"हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल"

"हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल"



बांहों मे उग आये

काँटों से

दुखी: न हो बबूल



पवन कहें तुमसे

संग मेरे झूम

नदिया कहें

झुलसी टहनियों से

परछाई बन

मेरी शीतल काया कों चूम

महा एकांत के वन के

मौन कों सुन



कराहती हुई पगडंडी के

थके नहीं पाँव

चलती ही चली जाए

इस गाँव से उस गाँव

मानो उसकी अपनी हो

अंतर्लीन कोई धून



मुझसे अभिन्न हो मनुज तुम

कमल पात पर

उछलती -लुढ़कती

यह बात कहें

शबनम की चैतन्य एक बूंद

हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल



kishor kumar khorendra

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