शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

760-तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन


तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन


 
यह प्रेम ..क्या सिर्फ हैं दैहिक आकर्षण

या हैं

तुम्हारे मन के प्रति

मेरे मन का समर्पण

मैं अपनी आंतरिक छवि कों

तभी निहार पाता हूँ

जब मेरे सम्मुख आते हैं

तुम्हारे उज्जवल नयनों के दो दर्पण

एक युवक मेरे भीतर हैं

जो तुम्हारी अंतरात्मा के भीतर छिपी युवती कों

करना चाहता हैं

अपनी निश्छल सम्पूर्णता कों अर्पण

केवल ईश्वर के चरणों में ही नहीं .....

मनुष्य ,..मनुष्य के समक्ष भी

कर सकता हैं ......

अपने अहंकार का विसर्जन

मेरी तीसरी आँख कों इसीलिए हुआ करता हैं अक्सर

तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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