शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

759-और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत"

और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत"



और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत

तब कही

तुम्हारे व्यवहार में मेरे प्रति

औपचारिकताओं का हो पायेगा अंत

दो कदम कभी

चल भी नहीं पायी हो

तुम आज तक मेरे संग

संकोचवश तुम्हारे गालों पर

कहाँ गुलाल पाया हूँ मैं मल

अब तक लगता रहा हैं

फागुन मुझसे

करता रहा हैं छल

तुम्हरी कोरी चुनरी पर

चढ़ नहीं पाया हैं

मेरे प्यार का गाडा रंग

तुम्हें लिखता आया हूँ

ढेरों पत्र

लेकिन कर न पाया

तुम्हारे मौनव्रत कों मैं भंग

सोच रहा हूँ

कौनसा मै ऐसा लिखूं छंद

की

जिससे आबद्ध हो जाए

तुम्हारा कोमल मन

तुम यदि अप्सरा हो

तो तुम्हारे सौन्दर्य में

ध्यानमग्न ....

मैं भी हूँ एक उमंग

न जाने कब कहोगी तुम

मुझसे आकर

तोड़ दो अपनी तपस्या

अब तक व्यतीत हो चुके हैं

पल क्षीण अनंत

और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत

तब कही

तुम्हारे व्यवहार में मेरे प्रति

औपचारिकताओं का हो पायेगा अंत





किशोर

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